बुकमार्क करके रखा एक दिन

फारुख   हमारी   सूमो का ड्राइवर   है .जो   जो पिछले चार दिनों से हमारे साथ  . है.... अपनी सुबह की शुरुआत  वो  दूसरे   ड्राइवरो की माफिक  किसी  भज़न  या  सूफी   संगीत   से  से नहीं करता है .."कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है "से करता है ..आज .उसके साथ उसका बेटा भी है ...दस साल का ..मै नाम पूछता हूँ तो वो शरमा के बताता है ."शाहरुख़ "....उसके हाथ में एक पेन ड्राइव है जिसमे उसके पसंदीदा गाने भरे हुए है ... टेक्नोलोजी अपना रास्ता खुद इख्तियार करती है..नंगी आँखों से देखा हुआ प्रत्यक्ष सच गर एक सवाल का जवाब देता है तो दूसरे कई सवाल भी  जेहन  में खड़े करता है   यूँ भी  देश के इस हिस्से में जब आप आते है तो आपके पास ढेरो सवाल होते है……कश्मीर के हर आदमी से आप एक सवाल  पूछना चाहते है  ......छतो पर से  डिश एंटीना झांकते दिखते है .सड़क किनारे अपने बेटे का हाथ पकड़ कर स्कूल बस का इंतज़ार करता पिता .रात की नींद की खुमारी  को तोड़ने के लिए उबासी लेते दुकानदार .. ... कुल मिलाकर   सुबह किसी शहर की आम सुबह की माफिक है बस हवा थोडी सर्द है ओर सूरज थोडा ज्यादा हसीन.....
..पहलगाम  के पूरे रास्ते  दुकानों  पर ,मुंडेरों पे  ....चौराहों पर .कही कही खेतो के बीच .... वो   हरी वर्दी   ओर   राइफल   थामे  खडा है मुस्तेदी से....ये जानते हुए भी के उसके आस पास के लोग उसे पसंद नहीं करते है ... वो बेपरवाह से खडा है ...कही कही चोराहो पे वे दो की जोड़ी में है ....... रास्ते में कई गांव पड़ते है ..फिरन पहने  जवान बूढे तमाम लोग ... कही कही फिरन के नीचे जींस भी दिख जाती है ..रास्ते में कुछ  आर्मी के ट्रक  काफिलों  की शक्ल में  गुजरते है ...उनमे से  एक जवान को  मै सेल्यूट    करता हूँ.....मेरे सेल्यूट   का वो जवाब देता है ....देखकर   फारुख का बेटा   उसे   कश्मीरी में  कुछ कहता है .......मुझे सिर्फ   सेल्यूट समझ   में  आता है  ....क्या इन बच्चो के मन में सेना के जवानो के लिए कुछ है? ..पहलगाम   बहुत खूबसूरत   है ..एकदम किसी लेंड्सस्केप  जैसा ...इतना की आपका कैमरा हाथ उठा देगा ..के .क्या क्या समेटूं ! .नाथू की रसोई वहां हिट है ..खूबसूरत कश्मीरी लड़किया जो ना जाने कितनी  मोडलो को इन्फीरियरटी कोम्प्लेक्स दे सकती है मोर्डन लिबास में नाथू की रसोई   में अंग्रेजी में  राजमा चावल या खीर मांगती है ....बेफिक्री से जीने की ललक यहाँ भी  मौजूद है ....उन   आंखो   में .देखी  जा सकती है ......खाना इतना लजीज है के आप उसके कूक को शुक्रिया कहकर ही निकलेगे ....लौटते  वक़्त शाम होने लगी   है ... ....पर वो अब भी वही खडा है ..राइफल   थामे.....नाम मायने नहीं रखता ... सिर्फ हरी वर्दी ...
. केंट एरिया है ..यहां   भी  जाम  लगता .. है ....एक  बस दिखती है ..देल्ही पबिलिक स्कूल श्रीनगर....  चार  पांच बसे ... ... में   अपनी गाडी   से ही बस की  फोटो लेता हूं .. जाने क्यों मन में एक अजीब सा ख्याल आता है. आप देश के किस हिस्से में पैदा होते है ...कभी कभी ये बात भी आपकी सोच का एक दायरा बनती है ..अपने तर्क बनाती है.....होटल लौटकर  एन डी टी वी खोलकर देखता  हूं है ..देश के एक  संचार मंत्री  पर करोड़े रुपये के डकारने के आरोप  है ....अपनी अपनी मनोव्रतियो के विकार   में ....अपने अपने पूर्वाग्रह  अपने मन में समेटे ..दंभ ओर अहं की गुर्राहटो के साथ  जिंदगी  में  शब्दों  की सियासत  का  भौंडा चौपड़ खेलते ...... हम लोग  उस जवान के आगे कितने छोटे है ....कितने छोटे .......




शाम ओर रात के बॉर्डर पे मेजर से मुलाकात होती है ...बुलंद  आवाज में ठहाका लगाने वाला मेजर .साहिरो .बशीर बद्रो...ओर मुनव्वरो  पर नहीं अपनी कोमिक्स के कलेक्शन पर बात करता है ...कश्मीर.... आर्मी ..कश्मीरियत ..स्कूल कोलेज  बांटने   को   कई किस्से है ...पर तफसील से..  कहने सुनने का वक़्त नहीं है .  .मोबाइल बीच  बीच  में  आवाज देता  है .....वक़्त को कुछ देर खींचकर ....मेजर  विदा  लेता है ....उसके हाथ  में बंधे प्लास्तर पर  मै "बेस्ट ऑफ़ लक" लिखना भूल गया हूं   ..  .सो  उस शाम के लिए   यहां  फराज साहब का एक शेर  चस्पा है....तुम्हारे लिए मेजर .....

"बजाहिर एक ही शब है फराके -यार मगर
    कोई गुजारने बैठे तो उम्र सारी लगी "

डिटरजेंट से धोई हुई "साइन्साना ख्वाहिशो" पे बाइस्कोप !


इधर हमें साइंस से कुछ ज्यादा ही उम्मीदे लगने लगी है ...जब भी हम अपने एक पुराने दोस्त को फोन मिलाते है ...उधर से कुछ अजीब सी आवाजे सुनाई देती है ...कुछ खा रहे हो....हम संशकित होकर पूछते है ......
क्या ?
समोसा ...
अकेले ?
नहीं ब्रेड में दबाकर .....
हमें मेज पर पड़ी मूंग की दाल को निहारते  है ....
बहुत   पहले  एक सीरियल   आया करता था ...स्टार ट्रेक ..पता  नहीं  आपको   याद   है के   नहीं ..जिसमे एक लम्बे कानो वाले मिस्टर स्पार्क भी हुआ करते थे ...उसमे  अजीब  सी किरणों से कही भी ट्रांसपोर्ट हुआ जा सकता था ....कसम से हमें भी  उम्मीद है   एक रोज जब हमारे यही फोनुआ दोस्त  राजमा  में  चावल मिलाकर खा रहे होगे .हम ट्रांसपोर्ट हो जायेगे ...........कल  जब  सब्जी   वाले ने  सब्जी  तौलते  हुए    “ तूने  बैचेन  इतना  ज्यादा   किया   ,मै  तेरा   हो  गया मैंने वादा किया वाला "....मोहमद अज़ीज़  का सोंग बहुत देर तक सुनाकर    अपना  मोबाइलवा  उठाया    .तो हमने फ़ौरन  आसमान में नजर  डाली ........ग्राहम बेल  एक ठो मुस्कराहट   दे रहे थे .....
  …   तो  क्या   वो दिन  दूर नहीं   जब    .  आप   अपने  बढ़ई   नसीम  भाई   को   ट्विटर   पे  सुबह  सुबह ट्विट  करोगे  के " .अमां  नसीम  भाई  .एक  खिड़की  का  पल्ला  जरा   बुरा  मान  गया  है  …आ  कर  थपथपा  दो.... या  फेस  बुक  पे   आप का इलेकट्रीशियन   आप को जवाब भेजे ..  .ऊपर    वाले    स्टोर   की   बत्ती जो   आंख  मार  रही थी  बदल दी है .....नीचे इनवर्टर का भी फ्युस चेंज हुआ है ...कुल मिलाकर इत्ते मेरे बनते है ...अकाउंट  में  ट्रांसफर कर देना .... 
तो   किबला   अपनी "  पुरानियो "  के    नाम   लिख  लिख  कर    उन्हें  गूगल   में    ढूंढने   की    ही   नहीं   बल्कि   दूसरी   ओर  कई   जहमते   उठाने   के  लिए  कमर कस  लीजिये
तो  भाई   लोगो  दी  एंड  करते  हुए  अपुन  चलता  है  ……









  ई .एम .आइ-

उठायो ख़वाहिशे ओर रख दो लाल घेरे मे
दीवार पर टॅंगी दूर से नज़र आती है.....

बदलो सफ्हा कॅलंडर का ...ये महीना भी गया

शह ओर मात !


आज   उसका  जन्मदिन  है  …इत्तेफाक   से  देहली    में ही  हूं...विश   करने   के लिए कॉल   करता   हूं तो  मालूम चलता है वो …. घर   में  है …एक्सीडेंट   हुआ   है …
सब  ठीक   तो    है …ना ….मै   बेवकूफी  भरा  सवाल   पूछता  हूं ….
हाँ   सब  ठीक   ही   होगा  …बिस्तर   में  जो  हूं ….वो  हंसती   है  ..एक  आध   फ्रेक्चर   है  बस  वो  .फोन पे कहती है  
….
उसके पास चेस बोर्ड का एक बड़ा कलेक्शन है ...अपने जन्म दिन पर वो सामने से  हम दोस्तों   से  मांगती थी.."मुझे एक यूनिक  चेस बोर्ड गिफ्ट करो..."उसके मेरे बीच एक अजीब सी अंडरस्टेंडिंग है ..साल में एक दो बार ही फोन पे बात करते है .वो भी ज्यादातर पेशेवर ...होली दीवाली पे एक दो एस एम एस इधर उधर हो जाते है . वो ऐसी ही है ..अपनी मर्जी से आपकी जिंदगी में दाखिल हो जायेगी ...अपनी मर्जी से गायब ....  जब  दाखिल   होगी    तो     पूरी    बेतकल्लुफी    से …..
मेरे  पिता   के  अलावा    वो  दूसरी   ऐसी  शख्स  है   जिसे   मै   अब  तक  चेस   में  हरा  नहीं  पाया ...विश्नाथन  .आनंद की तगडी  वाली फेन  है......फिलहाल .वो डब्लू  एच  ओ  में किसी बड़े ओहदे पर है .....
.बीच में एक बार ली मेरिडियन में टकरा गयी....डब्लू एच ओ के किसी प्रोजेक्ट के तहत आयी थी ...
".चल इकठे लंच करते है.."...मुझे सी एम इ  से उठा कर ले गयी....
 "लिखने   पढने   का शौक अभी बाकी है या  सिर्फ    पैसे कमा  रहे   हो  ….....खाना खाते खाते वो पूछती है...
खाते खाते मै  अचानक   रुक जाता हूं ....".आज तो करवा चौथ है न....."
तो ....तुम तो ऐसे रुक गए हो जैसे अमेरिका में दूसरी   कोई   इमारत   उडी   हो  .. .तुम   भी  तो   खा  रहे  हो !
नहीं.....मै ....!!
मेरे मियां ने  तो   कभी इस दिन शराब नहीं छोडी ..!
मै   हक्का  बक्का   उसका  चेहरा   देखता   हूं …..
चिंता   मत   करो …… …..मेरा डाइवोर्स हो गया है....!
आई  ऍम  सॉरी  …!
वो   मुस्कराती   है …"लेप  टॉप  लेकर  घूमेगे …. जेब  में नया  लेटेस्ट   मोबाइल …पर   मन  में वही  करवा  चौथ …"
   हंस  कर  सच   बाते  कहना उसकी फितरत है
.जानता था उसकी शादी शुदा जिंदगी में पिछले  कुछ   सालो से कुछ उथल - पुथल है पर कुछ चीजे बेहद निजी होती है उनमे यूं  ही एंट्री नहीं ली जाती ....ओर कुछ सवाल पूछना उनके जवाब सा ही मुश्किल होता है
उसने  मेरी आँखों के सवाल  को शायद पढ़ लिया है .....…इसलिए वो दो वक़्त को एक साथ जोड़कर लाती है......
"ज्यादा पढ़े लिखे लोगो के नाखून अद्रश्य होते है . साथ रहकर ही दिखते है …....कभी  कभी .औरत अपने भीतर रुक जाती है....मै भी  कुछ साल रुकी रही...."...पर  फिजिकल वोइलेंस…के साथ    शराब …उसे   डाइजेस्ट   करना     मुश्किल    था ….सो  ...एक रोज …  मैंने  भी   दो  जोरदार पंच ....  गिर   पड़ा   …... हगामा मच गया....
"इन  शोर्ट ….बाहर " … वो हंसती है ....
सब   कुछ   उसकी  हंसी   जैसा  आसान  नहीं  था  …उन खरोंचो  से बाहर  निकलना ....  दोबारा   पी  एच  डी  करना  ..पढने  के  लिए  बाहर  जाना !
"अब ! .....मै पूछता  हूं.....
.हर   खाने   की  अपनी  मुश्किलें   है …नाते  रिश्तेदार   ..कभी कभी तो ऐसा लगा  जैसे  कन्फेशन बोक्स में खड़ी  हूं.....वो जिसे हम समाज कहते है ना... इसका  बड़ा  तंग जुगराफिया  है  यार .....एक तलाक़ के बाद औरत "सेकंड हेंड "हो जाती है....
उसे चाइनीज पसंद है ...ओर बीच बीच में ब्लेक कोल्ड ड्रिंक के घूंट भरना ....
औरतो  को  यूटीलाइज करने  के  लिए  कंडीशंड करने  वाले  समाज  के  फोर्मेट  हर तबके हर क्लास के अलग है ..जब भी सामने वाले को पता लगता है अकेली हूं... .डाईवोरसी ..उसका बिहेवियर  बदल जाता है . जैसे साला कोई नोटिस बोर्ड टंगा  हो "अवलेबल "....तुम अस्सी प्रतिशत मर्द एक सा सोचते है ...आँख की स्क्रीन पे लिखा आ जाता है...”पकड़ लो.”... वो किसी ने कहा था ना....... …... जिस्म पे गोश्त चढ़ते ही आदमी की नीयत बदल जाती है........... ठीक लिखा था ..
पीछे   फिश  पोंड  में  तैरती    मछली   एक  पल  को  रुक  गयी  है  .जैसी  उसकी  बात  की  तसदीक   कर  रही  है …

घर !!
वो  बिस्तर पे है ...मुझे देख मुस्कराती है..चेस बोर्ड  उसके  किनारे रखता हूं......
थोबडे की सूरत ज्यादा   तो नहीं बिगडेगी   ना ....वो पूछ रही है .....
फिर एक्सीडेंट का खुलासा होता है ...
 ....रात को गाड़ी से  लौट रही थी तो पीछे कुछ शोहदे लग गये ....बदतमीजी   करने  लगे … सो  गुस्सा  आ गया  ... अपनी कार  उनकी मोटरसाइकिल  में मार दी..पर ..…
कुछ देर वहां बैठकर  मै निकलने के लिए उठा हूं....आंटी कहती है .
"समझा  उसको...….सरफिरी   है …."...
सरफिरी!  मै  बाहर निकल आया हूं.....

ऐसे  सरफिरे  हालात   की बिसात  पे  बरसो से  मात खा रहे है.!





त्रिवेणी-

फलांग जाता है कुछ किस्से...... कही देर तक रुकता है
शोहरत के मोडो पर  मगर अक्सर चौपाले  लगती है.......

एक कमज़ोर लम्हा मेरे माजी का अक्सर मुस्कराता है

हमारी पहली गर्लफ्रेंड ...नीलू भाई...ओर एक क्रिकेट मैच !!!!


उन दिनों सपने बहुत छोटे होते थे यूं  कहिये बलिश्त भर के ..ओर लगभग एक जैसे ..ट्विन्स .का भ्रम देते ...पर गुजरे वक़्त के साथ एक बात  हमने जानी है की लड़कियों में कुछ  हुनर  शायद पैदाईशी  होते है . मसलन वे  किताबे कापियों पे साफ सुथरे कवर चढा कर रखती है ..उनपे सुन्दर- सुन्दर चिटे  ...वे बड़ी गौर से आगे की लाइन में बैठकर टीचर की एक एक बात सुनती है ...ओर फिर उन्हें  सिलेवार   अपनी   कोपी   में  साफ़ सुथरी  राइटिंग  में  लिखती है ...मै कितनी भी कोशिश कर लूं आज तक एक भी फूल पत्ती सीधी भी बना नहीं पाता ..  नये स्कूल में एडजस्ट  करना बड़ा मुश्किल काम होता है .. पापा का ट्रांसफर  जब देहरादून  हुआ...हमारी सबसे बड़ी परेशानी यही थी.....कई रोज तक  आप  अंडर ओब्सर्वेशन  रहते है ..आपके चाल चलन   को देख परख    फिर   आपकी  एंट्री  किसी खेमे   में  होती   है ..ओर फिर को -एड स्कूल ...  हमें जोग्राफी पसंद नहीं थी....मैथ्स से हमें डर लगता था ....आर्ट हमें आती नहीं थी ...तो नये स्कूल   में इम्प्रेशन   बनेगा कैसे ......कुल जमा उन दिनों हमें दो तीन चीजो में महारत   हासिल थी....कंचे खेलने  पतंग  उडाने .में या क्रिकेट खेलने में  ........

उन दिनों देहरादून आज सा नहीं था .खूब घने पेड़ ....पंखे भी न के बराबर घरो में होते थे ...हमारे घर के पीछे लीची का एक बागः था ...सामने के घर में दो बड़ी लड़किया   रंजू  दी ओर पूनम दी ….ओर एक उनका लफंगा भाई....नीलू ...जो छुप छुप के लीची के बाग में सिगरेट पीता...उनके घर  का  एक  नियम था .....उसका बाप  रोज  काम पे जाने से  पहले  नीलू  भैय्या  को  कई गलिया देता ..वो एक किताब   हाथ में  लिए सर झुकाये सुनते ..   ....बाप के दुकान  पे जाने  के  बाद  वो  किताब  खोलकर धूप में   पढने   बैठते  ...ओर .उनकी  मां रोज  घी चुपड़े आलू के परांठे  खिलाती ...परांठे   खाने    के करीब  दस  मिनट  बाद  नीलू  भैय्या   अपनी साइकिल   निकालते ..ओर फिर   दिन ढलने से थोडा पहले लौटते ... .. पिछले  तीन सालो से वो  दसवी   के  एक्साम   की तैयारी   में लगे हुए थे ....नीलू भैय्या का संक्षिप्त परिचय अगर देना हो तो ...तब रिचर्ड अटेनबरो  की  "गांधी "रिलीज़ हुई ..मां ने नीलू भैय्या के हाथ में पैसे रख के मुझे ओर छोटे को गांधी दिखा लाने को कहा ...नीलू भैय्या हमें "तकदीर" देखा लाये ....हेरोइन ओर दूसरा हीरो याद नहीं पर उसमे एक हीरो शत्रुघ्न सिन्हा थे वो याद है..
.उनकी छोटी लड़की पूनम दी  किसी ब्यूटी  पार्लर का कोर्स  कर रही थी उन दिनों.....तो अक्सर शाम को हमारे पैरो हाथो पे तरह तरह के उबटन मेल जाते फिर धोये जाते ...बदले में हमें चम्पक ...नंदन   या इंद्रजाल   कोमिक्स   पढने  को मिलती ... पर मै चेहरे पे कुछ नहीं करने देता ..... एक रोज उन्होंने एक लेप निकला जिसकी  अजीब  सी   शक्ल  थी ...मुझे डील ऑफर हुई इसे चेहरे पे लगवायोगे तो दो तुम्हारी मर्जी की कोमिक्स ...तुम्हे खरीद कर दी जायेगी ...हमने मन कडा किया पर  जैसे ही लेप नजदीक  आया  हमने  विद्रोह  कर दिया ....ओर भाग   निकले!
गली के  कोने पे  किसी सरकारी  आदमी  का  मकान था ....उन्हें घर के बाहर अक्सर एक सरकारी जीप खड़ी रहती ओर उसमे ऊँघता एक ड्राइवर ...  रोज सुबह  उसमे  एक लड़की बैठती ...पतली दुबली . गोरी ....उसकी आंख पे एक चश्मा टिका  रहता .. ...जो उसे पढने वालियों जैसा लुक  देता था ...गली में वो कम दिखती .... मेरे क्लास में ही पढ़ती थी....कभी कभी  नजर उठाकर  मुझे देखती...मन करता तो मुस्करा देती ..उनके घर वाले गली के बाकी लोगो से थोडा  कम मेल जोल रखते ...
एक महीना बीत गया .मै सेकंड लास्ट बेंच पे एक तेल चिपुडे लड़के के साथ  बैठता ...जो अक्सर पीरियड में टोफी निकाल कर खाता...दिन भर वो इतनी टोफी खाता की मुझे डर लगता  की कभी इसको हाथ भी मारा तो इसके मुंह से टाफिया ही निकलेगी...स्कूल से पैदल का रास्ता करीब आधे घंटे का था ...ओर मै रोज पैदल जाता .सच कहूं तो बड़ा मजा आता .लौटते  वक़्त  जरूर  सड़क  की चढाई   थकान  देती .... एक रोज स्कूल से लौटते वक़्त जीप मेरे बगल में रुकी ....वही थी ...एक दो बार की न नुकर के बाद मै जीप में बैठ गया ..पूरा रास्ता हम दोनों में कोई बात नहीं हुई...तीन रोज तक यही होता ..मै बिना थैंक्यू  कहे  घर के सामने उतरता ....
तुम कोमिक्स पढ़ते हो ..पांचवे दिन उसने पूछा
हां
मेरे पास बहुत सारी है  ....पढोगे .. मैंने देखा उसके गोरे चेहरे पे होठो के उपर भूरे से बाल है ....मै सिर्फ उतने ही सवालों का जवाब देता जितने वो पूछती ....
धीरे धीरे हम दोनों में जमने लगी ...वो हमारी ड्राइंग की किताब भरती ...उसके दादा दादी अक्सर  शाम को  आंगन  में चेस खेलते रहते ओर साइड  में बने झूले  पे हम दोनों खेलते ..... तब हमें डायरी रखने ओर  उसमे  जो अच्छा   लगा उसे  लिखने का नया नया शौक़ हुआ था ..ओर वो  हमारा   सीक्रेट   था ...पर जाने  क्यों   हमने उससे   शेयर   किया ...हमारी डायरी की पहली पाठक वही थी ..
हमने एक महीने में उसकी सारी कोमिक्स पढ़ डाली .फिर हमें गिल्टी फील   हुई  के  अब तक हमने उसे कोई कोमिक्स नहीं दी ...हमने सोचा उसे कोमिक्स खरीद के ही गिफ्ट दे देंगे
समस्या ये थी की पैसे आयेगे कहां से ???
. मै..वो  लेप लगवाने पूनम दी के सामने पहुंच गया ..
आधे पौन पौन  घंटे के उस एक्सपेरिमेंट के बाद  पूनम दी ने नीलू भैय्या को पैसे थमाए ओर हमारे लिए कोमिक्स लाने को कहा...दिन भर गली के मुहाने पर बनी एक छोटी सी दीवार पे बैठे नीलू  भैय्या की राह तकते रहे ...शाम होने से कुछ पहले नीलू भैय्या अपनी उस ऐतिहासिक साइकिल पे अवतरित हुए ..पर उनके हाथ में कोई कोमिक्स न देखकर हमारा दिल धड़का ....
नीलू भैय्या ....कोमिक्स
कल ले आयूंगा ....आज दुकान बंद थी ....नीलू भैय्या थके थके से बोले ......
झूठ बोलते हो .दुकान तो खुली थी ......मै देख के आया था .बात सच थी....मै रुआंसा हो गया ....
नीलू भैय्या ने मुझे हड़का दिया .....आंखू में आंसू  ओर गुस्सा होके हम कई देर वही बैठे रहे ...थोडी देर में उनके पिता जी का स्कूटर आता दिखाई दिया ....इससे पहले के वे मफलर उतार के स्टेंड पे लगा कर गेट खोले ....हम दिल में प्रतिशोध  की ज्वाला लिए उनके पास पहुंचे ....अंकल नीलू भैय्या बाग में सिगरेट पीते  है "ओर भाग  लिये.....
उस शाम नीलू भाई की जबरदस्त सुतायी  हुई!!!!!!

तो पढने  लिखने की बाबत  तमीज  हमें वही  से आई ....उसी की सोहबत  में हम कोर्स की किताबो में थोडा ध्यान रमाने लगे ...फिर एक घटना हुई ..... हमारी क्लास के दो दादा थे एक था  रस्तोगी दूसरा कुलदीप ..दोनों के बापों की अगल बगल दुकाने थी .. फ्रायड ओर मंटो से पहले  कुलदीप   की मेरी जिंदगी में  एंट्री है ..औरत मर्द के रिश्तो के बारे में उसकी मालूमात कुछ ज्यादा है ..इंटरवल में लड़को का समूह उसके इर्द गिर्द इकठ्ठा होता है ...उसके बाप की स्टेशनरी की दूकान है ...साथ में किताबो की भी...कुलदीप के बस्ते में कई किताबे पीछे रखी  होती है ... पिछले दो दिनों से कुलदीप हमें रोज  लंच   में  बुलाता .पर हम नहीं जाते ...हालांकि  हमारा मन का एक कोना जरूर वहां जाने को मचलता  ...
तुझे उसके पास नहीं जाना  वो मुझसे कहती है
क्यों ?
वो अच्छा लड़का नहीं है
क्यों ?
वो जवाब नहीं देती.....
दो रोज बाद कुलदीप छुट्टी के वक़्त मुझे पकड़ लेता है ...".क्यों बे "दो दिन से बुला रहा हूँ .आता क्यों नहीं ....
मै बेग छुडाने की कोशिश  करता हूँ  ....वो दूर से देख रही है ...
जा लड़कियों के साथ लंगडी टांग खेल....कुलदीप धक्का देता है ....
मै गिर गया हूँ....कुहनी छिल गयी है ...
क्या कह रहा था ?वो पूछती है .
कुछ नहीं......
तीन दिन   बाद  स्पोर्ट्स  के पीरियड  में  वो कुलदीप के पास बैठी है .. कोई जवाब देने कुलदीप उठा है .बैठते ही चीखा है .उसने पेन्सिल सीधी करके रखी है........
 बाद में दूसरे  लड़को ने  हमें  बताया  की सरदार ने कसम खायी.. है .वो हमें माफ़ नहीं करेगा... दिन गुजरते रहे पर   शायद मेघा के ड्राइवर  का डर था जिसने कुलदीप को रोके रखा ......
तभी  स्पोर्ट्स वीक हुआ .. कुलदीप हमारी टीम का  क्रिकेट कप्तान था ...मुझे मालूम था वो खुंदक  में मुझे टीम में शामिल नहीं करेगा ..हमारी क्लास का  क्रिकेट  मेच सीनियर क्लास से था ठीक मेच से एक रोज  पहले ग्यारहवे  खिलाडी को दस्त लग गये ....दिन भर उसके दस्तो के रुकने का इंतज़ार किया गया ..फिर. हमें  ग्यारहवे खिलाडी के तौर पे   टीम   में शामिल किया  गया .क्यूंकि पूरी क्लास में सिर्फ पंद्रह  लड़के थे ....बाकी बचे तीन में एक वही तेल चिपुडा ओर दो उसके भाई बंद थे ..तभी   इंडिया  नया नया  पहली बार  वर्ल्ड कप जीता था ...इसलिए क्रिकेट पे बड़ा जोर था ..
इससे पहले हमने जितने भी मैच खेले थे  अपने मोहल्ले में खेले थे ..हर टीम  एक नयी बीस रुपये  की लेदर  बाल लेकर आती थी .जिसे दो दो रुपये  इकट्ठे करके  हर खिलाडी लाता था ....    जीतने वाली टीम को  दोनों  लेदर  बाल मिलती थी .हमारी जिंदगी की फाइल में यूं तो कई मैच दर्ज है .पर इतने दर्शको में जिसमे लड़किया भी शामिल हो..हमारा पहला मैच था ....आखिरी दो  गेंदों  में दो  रन चाहिये थे ....हमें नाइन डाउन भेजा गया ...सरदार हमारी टीम का कैप्टन था ...हमें इस बात की ताकीद  मिली  की गेंद के बोलर के हाथ से छूटते  ही आंख बंद करके भाग लेना है ...जबकि हमें अपनी क्रिकेट काबिलियत पे भरोसा था ....इधर बोलर चला उधर रस्तोगी ने चिलाना शुरू किया भाग ....पर हम भागे नहीं .धड़कते   दिल  से .बल्ला  घुमा दिया  ....खुदा का शुक्र है गेंद बल्ले पे आ गयी .. ओर..सरदार ने हमें माफ़ कर दिया ....

अगले साल हमारा ट्रांसफर वापस अपने शहर हो गया .... एक बैग में ढेर सारी कोमिक्स भर के मुझे दे  गयी....एसट्रिक्स की कोमिक्स ...अब सुना है नीलू भैय्या  दूकान पे बैठते है ....दोनों बड़ी बहनों की   शादी   हो गयी है .छोटी ने लुधियाना   में कोई  पार्लर  खोल  रखा है ...सुनते है हमारे जाने के दो साल बाद उनका भी ट्रांसफर हो गया था..... मेघा पता नहीं कहां है....मेरे कलेशन में आज भी वो कोमिक्स पड़ी है .जिनमे से एक दो के ऊपर उसका नाम लिखा है .....

कहते है ये वक़्त तकनीक का है पर तकनीक की  दुनिया की अपनी पेचीदगिया है .....बाजार   की  अंगुली थाम के   बढे होते बच्चे   है ..चौबीस साल के घनघोर कैरियरिस्ट है....ज्यादा   फ्लेक्सेबल  रीड की हड्डिया है ....ख्वाहिशे   डबल   अंडर लाइन करे भागता  युवा  है    ...   अपने अपने  इगो की  बड़ी  बड़ी  आलीशान  ड्योढी में  बैठकर इतराने वाले कुछ अधेड़   दुनियादार   लोग है ...  ...   इत्ते  बड़े  बड़े  रंग बिरंगे  ग्लो साइन बोर्ड   है जो रात  को  चमककर सच ओर झूठ  को  गडमड कर देते है .. .   ..ओर हर   ख्वाहिश पे  अलादीन  का चिराग न सही ...एक अदद  इ एम  आई   जरूर  है ...काश चेप्टर होते जिंदगी के भी .....किसी स्कूल में सिखाया जाता ...कैसे   खामोशी   से   मुमकिन है .......इत्ते  मुखोटो  में  रोज आवाजाही .....कैसे पकड़ना जमीर का इक कोना ...जब दुनियादारी का बुलडोज़र बढा आये

जिंदगी !तेरे कुछ दिनों को रिवाइंड करना है...



"एयर पोर्ट पे जो सबसे बोर सी शक्ल वाला आदमी नजर आये समझो वो मेरा ड्राइवर है...हिन्दुस्तान में ही  आदमी  बिना  कोमन सेंस  के ठाठ  से गुजारा  कर सकता है  ओर वो  ठेठ हिन्दुतानी   है .... ओर हां  गाडी की  खिड़की खोलकर सिगरेट पीना .. वरना मेरी  बीवी  मेरी ऐसी-तेसी फेर देगी.".गाडी बीवी की है .... .प्रशांत ने फोन पर कहा था..बॉम्बे की  उस दो दिन  की वर्कशॉप  की  मेरी राते पहले से शेड्यूल्ड  हो गयी थी...... "मूर्खों से एक खास दूरी बनाये रखने की विधा का नाम शिष्टाचार है ."..प्रशांत अक्सर ऐसे  दार्शनिक जुमले वाजिब समयों पर आपके फोनों में ठेला करता है... .गैर वाजिब समय मतलब....रात  के तीन बजे ..ढाई बजे ........ ओर्थोपेडिक वाले एमेर्जेंसियो में रात भर भटकते है मालूम   है ...पर वो आज इमरजेंसी में है ये   पूरे  देश भर में फैले उनके दोस्तों को पता लग जाता था ...

 दिन भर की वर्कशॉप के बाद  हम तीनो दोस्तों  ने मिलना था ....तीसरा राजीव था  .....उसे  सलेक्टिव  एग्रोफोबिया था ...यानी भीड़ से डर .....भीड़ भाड़ वाली जगह  वो स्कूटर या बाइक पर अनकम्फर्टेबल  हो जाता ..ऐसी जगह  अवोइड  करता...  एक ही जींस को कई दिनों तक पहनकर घूमता... ..पूछते  तो  कहता .लकी जींस है.... अपने एक सत्तर के मोडल पुराने स्कूटर पे घूमता .....उसको याद करते ही छवि मिश्रा याद आती है ...  .जूनियर .सीनियर  कई लोग उसके लिए कतार में थे ......ओर .छवि उसके पीछे पागल थी ... छवि के मामी पापा यू एस में थे ...इंडिया में वो अपने दादा दादी के साथ रहकर पढ़ रही थी... पर जाने क्या हुआ उस रोज जब हम लोकर रूम में क्रिकेट खेल रहे थे ...छवि उससे कुछ बात करने आयी थी......जिसके बाद  वो गुस्से में थी ....."कावर्ड्स" ...तुम्हारे दोस्त में गट्स नहीं है ...हाउ ही फेस  दिस वर्ल्ड  आउट साइड दिस केम्पस  ....मुझसे बोली थी...मुझे बड़ा अजीब लगा था ..हम दोस्त जानते थे उसे छवि पसंद है.फिर क्या हुआ ? अगले तीन महीने में वो यू एस चली गयी.......
.. कहते है जो आदमी बीस की उम्र में भला होता है वो तीस की उम्र में भी भला ही रहता है ओर चालीस की उम्र में भी .. राजीव शायद जन्म से भला था ...अपने ठेठ भलेपन के बावजूद    उसने  हमें  कई अजीब सी आदते सिखाई जिन्हें शरीफ लोग शरीफाना नहीं कहते .मसलन ..कोल्ड ड्रिंक में एक एक्स्ट्रा आइस क्यूब ओर नमक डालकर पीना ....अंडो की हाफ  फ्राई में कुछ इनोवेशन कर टोमेटो फ्राई बनाना ..हेंग ओवर के लिए दही खाना ... अब  सोचता हूं प्यार केवल कैम्पस  की  उस चाहरदीवारी  में ही सरवाइव कर सकता है ..  .…बाहर की  दुनिया की जद्दोजेहद  में  साले बड़े बड़े गम है .
प्रशांत ने मेरी सहूलियत के लिए गाडी रख छोडी थी ..चूंकि मेरी कांफ्रेंस होटल रेनिसेंस में थी .तो ये तय हुआ की दिन भर वे अपना कामकाज करेगे ओर मै कांफ्रेंस अटेंड करूंगा ...रात को सब इकठ्ठा होगे .
पर दोपहर  बाद वर्क शॉप   के  तीनो   टोपिक  में  कुछ नया नहीं था सोचा शायद राजीव यहां से नजदीक हो... अगला अच्छा टोपिक डेड घंटे बाद था .... ..  राजीव को फोन मिलाता हूं…"
.आधा  घंटे  का  रास्ता  है   अगर  ट्रेफिक    ठीक   रहा  तो …तू पहुँच जायेगा वो  कहता है ......… तकरीबन पैंतालिस  मिनट ....  बाद  उसे  किसी  हॉस्पिटल   के  नीचे  खडा  पाया "..दो  पेशंट  है ... राउंड   लेना   है ...दूसरा  दूसरे हॉस्पिटल में है  …तू  साथ   चलेगा मुश्किल से  ……पांच  मिनट   लगेगे …तब तक मै इसको देख आता हूँ मै वही ड्राइवर के साथ रुकता हूँ ..हॉस्पिटल किसी पुरानी इमारत  सरीखा सा है बाहर  से देखकर लगता नहीं की हॉस्पिटल  भी है ...बाहर  केवल एक बोर्ड लगा हुआ है ....इंग्लिश  के बाद  मराठी में ऊपर से  कुछ लिखा हुआ . .में ..शायद राज ठाकरे के डर से …पांच मिनट बाद वो नीचे उतर के आता है ..प्रशांत के ड्राइवर को वही छोड़ हमें  दूसरे हॉस्पिटल जाना है ...रास्ता सिर्फ कुछ फीट चौडा है एक तंग गली जैसा ...दोनों ओर बनी दुकाने .इतनी तंग की सामने से अगर कोई फॉर व्हीलर आ जाए तो रास्ता ब्लोक हो जायेगा .." वही साली गरीबी ....एप्लास्टिक अनीमिया ...मियां बीवी दोनों मजदूर .....खून तक चढाने के पैसे नहीं .....वो गाडी में बैठते ही  कहता है....वो मेडिकल कॉलेज में किसी से बात कर रहा है .उस पेशेंट को एडमिट करवाने के वास्ते ......मै हैरान हूँ के इन तंग गलियों में वो कैसे इतनी तसल्ली से गाडी चला रहा है .....
पर हम खाना नहीं खा पाये ...दूसरे पेशेंट   को देखते  वक़्त  उसकी एक ओर इमरजेंसी  कॉल आ गयी..इसलिए  मै  वापस अपनी कांफ्रेंस  वाले  होटल  आ गया .... ..
रात ९ बजे प्रशांत के घर.....
"..साला बड़े दिनों बाद अपने स्टाइल में पियेंगे ..जग्गू दा  के साथ ..यहाँ तो पिछले आठ सालो से बुढढो  के साथ पी पी कर बोर हो  रहा हूँ ....
राज नहीं  आया अब तक "वो पूछता है ....फोन मिला उसको .....
कोई पेशेंट सीरियस है उसका ...मै कहता हूं.....
वो फोन मिलाता है...कहता है आधे घंटे में पहुंचेगा ....तू फ्रेश हो ले .. तकरीबन आधे घंटे हम पाकिस्तान ओर न्यूजीलेंड का मैच देखते है.... करीब एक घंटे बाद वो घर में घुसा है.........  'साले कहाँ था अब तक .....तेरे चक्कर में भूखे बैठे है ....
...खाने का  क्या है ..बहुत भूख लगी है ....प्रशांत उसके लिए  एक गिलास में वाइन  भर रहा  है
"मेरा मत बनाना ....कॉल आ सकती है" ..राज मना करता है ...एक पेशेंट सीरियस है ...
राज  प्लेट में रखकर खाने लगा है..... प्रशांत के मोबाइल पर  नीरव का फोन है....वो  राजकोट में है ..बहुत बड़ा सेट अप  है ..अकेला मेनेज नहीं कर पा रहा हूँ... राजीव को बुला रहा हूं.....आता नहीं.साला नखरे दिखा रहा है ....उससे .कुछ देर इधर उधर की बाते होती है ......
जाता क्यों नहीं....... अच्छा ऑप्शन है तो ........फोन  रखने के बाद मै  राजीव से   कहता हूँ
वो सिर्फ मुस्कराता है ...
"क्यों साला एगो बीच   में आ रहा  है ... प्रशांत  उससे  कहता  है ... ...... तू  ओर नीरव तो  सबसे ज्यादा क्लोज़  थे ..इतना अच्छा पैकेज ओफर  कर रहा है ...
... वो चुप है...चुपचाप एक दो कौर मुंह में डालता है ....फिर कहता है
 याद है ...६०   -७०   के  आदर्शवादी  सिनेमा  का भाई  होता था  … बलराज  साहनी टाइप  ……भाई ऐसा  ही है .……पूरी  जिंदगी  हम में  खप  गया ...एक घूंट पानी ...
"उसकी तब नयी नयी शादी हुई थी….. तब ..पापा  को पेरालेसिस का अटेक हुआ था...उससे रिकवर नहीं नहीं कर पाये   प्राइवेट  जॉब.....लिमिटिड आमदनी…. एक  पूरा घर अचानक अपनी जिम्मेदारी लिए भाई के सामने आ गया ... स्लम एरिया का बी एम् एस डोक्टर कितना कमा लेगा .वो भी  ..जिसमे दया कूट कूट के भरी हो  .....   पर वो खीचता रहा दिनों को...हमें अपने आप को .भाभी को.... …… वो  स्कूटर  ..वो हँसता है ....  . सत्तर का मॉडल.... ....भाई  का था  .....  एक  बार  कॉलेज  आया था .बोला तू इतना पैदल चलता है .तेरे सब दोस्तों के पास बाइक है....अगले दिन  भिजवा दिया ... एक ठंडी सांस ......साली कोई जींस मेरे लिए लकी नहीं रही... एक्चुली मेरे पास तब   कुल तीन जींस थी ......फिर ...कुछ देर की खामोशी ...प्रशांत   घूरकर  वाइन  में  पिघलती   आइस को  देखता    है  ….एक  घूँट   में  सारी     पीकर  …..  उठकर बेवजह की चहलकदमी  करता है ...उसकी आदत बदली नहीं अभी ...कोलेज टाइम  में भी  बैचेनी   में  पूरे कमरे में घूम जाता था ..
. भाभी की आंखे  चुभती  थी  उन दिनों ..वो कुछ कहती नहीं थी पर उनकी आंखे जैसे तहरीर करती थी  अब भाई ..४५ की उम्र में पहला अटेक....हार्ट के पेशेंट बन गए है .... थक गये है बोझा ढो के हम सब का...इत्ते सालो से ....अब मेरा टर्न है... यार…."
हम तीनो   के बीच   खामोशी    फिर   पसर  गयी  है .. प्रशांत ने मेरे सिगरेट के पेकेट से सिगरेट जलायी है ... सिर्फ सिर्फ जग्गू दा अकेले गा रहे है...."अपनी आग को जिंदा रखना कितना मुश्किल है "
"तेरी  एक  बेटी  है  न तीन  साल  की …क्या  नाम  है  उसका "? ……मै माहोल को चेंज करने की कवायद में हूँ....
"ये ....वो मोबाइल में फोटो दिखाता है ...".छवि "!



रोज  उचककर  देखता था जो  इस जानिब
वक़्त को फलांगने की   बेजा कोशिश में .....
आज सुबह उसी लम्हे ने दम तोडा है


पुनश्च: कायदे में  तो इसे यूं लिखा जाना चाहिए था ..जिंदगी तेरे कुछ दिनों की रिवाइंड करना है ताकि मै उन्हें तरतीब से लगा सकूं.आपके तो मालूम  नहीं  पर वाकई मेरे पास कई ऐसे दिन पड़े है जिन्हें रिपेयर की जरुरत है !